Tuesday, 21 July 2020

मज़बूत लोकतंत्र में भारतीय न्यायपालिका की भूमिका


General Studies-II . Judicial Review .Judiciary parliamen
    An Ineffectual Angel
यह The Hindu में 29 अप्रैल को प्रकाशित आलेख An Ineffectual Angel का भावानुवाद है। इसमें बताया गया है कि भारत की न्यायपालिका के ऐसे शब्दाडंबरों का कोई अर्थ नहीं है, यदि वह उन मामलों से बच निकलने का प्रयास करती है, जो इससे लोकतंत्र के वृहद् सिद्धांतों को लागू करने की अपेक्षा करते हैं।

संदर्भ

एक औपनिवेशिक शासन से लोकतांत्रिक गणराज्य में बदलना भारतीय इतिहास की सबसे विलक्षण उपलब्धियों में से एक था। ओर्निट शानी ने अपनी पुस्तक How India Became Democratic में उन कठिन प्रयासों के बारे में जानकारी दी है जो भारत के पहले आम चुनाव के आयोजन के लिये किये गए थे। संविधान निर्माताओं ने एक झटके में संविधान में यह निर्धारित करके कि चुनाव सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर कराए जाएंगे, देश की आबादी को प्रजा (Subject) से नागरिक (Citizen) में बदल दिया। यह एक ऐसी उपलब्धि थी जिस पर कई लोगों को संदेह था कि ऐसा हो पाना संभव नहीं है, लेकिन इसकी सफलता पर हम सभी को गर्व होना चाहिये।

स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव

नागरिकों का मताधिकार इस उपलब्धि का मूल तत्त्व है। मत यानी वोट के माध्यम से ही लोकतांत्रिक वैधता का समय-समय पर नवीनीकरण होता है और गणतंत्र की नींव स्थिर बनी रहती है। किंतु केवल मतदान करना भर ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह मतदान एक स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव का हिस्सा होना चाहिये। इसे सुनिश्चित करने के लिये कई संस्थागत कारकों और परिस्थितियों का होना आवश्यक है तथा इन सबको साथ लेकर ही मतदाता द्वारा मतदान का अंतिम फर्ज़ पूरा होता है।

एक सार्थक गतिविधि बना रहे मतदान

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने उपरोक्त मूल सिद्धांत को मान्यता दी है। समय के साथ विभिन्न निर्णयों के माध्यम से न्यायालय ने उन सक्षम स्थितियों का निर्धारण किया है जो सुनिश्चित करता है कि मतदान एक सार्थक गतिविधि बना रहे। जैसे- किसी भी नागरिक को मनमाने ढंग से मतदान से वंचित नहीं किये जाने का अधिकार। इसीलिये न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मतदान संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत मिली मौलिक स्वतंत्रता है। मतदाताओं को कुछ बातें जानने का अधिकार (Right to Know) है। इसीलिये प्रत्याशियों द्वारा कुछ जानकारियों की घोषणा करना अनिवार्य है। इसके अलावा, गुप्त मतदान का अधिकार...और इसीलिये न्यायालय ने मतदान में NOTA विकल्प को शामिल करने का आदेश दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह दुहराया है कि निर्वाचन प्रक्रिया में जनता का विश्वास होना गणतंत्रात्मक लोकतंत्र के बने रहने के लिये महत्त्वपूर्ण है और यही वे संस्थागत सुरक्षा उपाय हैं जो समूहबद्ध होकर इसे सुनिश्चित करते हैं।

न्यायिक निष्क्रियता का मुद्दा

किसी भी अन्य प्रतिस्पर्द्धी प्रक्रिया की तरह इस प्रतिस्पर्द्धा के ढाँचे का गठन करने वाले बुनियादी नियमों को एक निष्पक्ष मध्यस्थ/पंच द्वारा लागू किया जाना चाहिये। यहीं स्वतंत्र न्यायपालिका की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जबकि लोकप्रिय धारणा के अनुसार न्यायालय की प्राथमिक भूमिका लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना हैलेकिन न्यायपालिका का इतना ही महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व यह भी है कि वह चुनावी प्रतिस्पर्द्धा के बुनियादी नियमों का अनुपालन सुनिश्चित कराए, जो कि स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव के लिये आवश्यक है। कुछ कारणों की वज़ह से यह कार्य राजनीतिज्ञों पर नहीं छोड़ा जा सकता और इसे न्यायपालिका द्वारा ही निष्पादित किया जाना चाहिये। इस प्रकार यह एक ऐसा विषय है जहाँ न्यायालयों को सामान्य से अधिक सतर्क रहना चाहिये क्योंकि यहाँ दाँव पर स्वयं लोकतंत्र की मूलभूत वैधता लगी होती है।

काले धन को बढ़ावा देता है चुनावी बॉण्ड

इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय न्यायालयों के हालिया निर्णय एवं आदेश, न्यायिक शब्दाडंबर और वास्तविक प्रवर्तन के बीच तारतम्य में कमी दिखाई देती है। सर्वप्रथम, जानने के अधिकार के संदर्भ में देखें तो पिछले वर्ष के पूर्वार्द्ध में चुनावी बॉण्ड योजना लागू की गई। अधिकांश लोगों का यह मानना है कि इसके ज़रिये सरकार ने काले धन को राजनीतिक दलों के पास और चुनाव में लाने की अनुमति दे दी। यह किसी से छिपा नहीं है कि चुनावी बॉण्ड योजना राजनीतिक दलों को असीमित और गुप्त दान लेने की अनुमति प्रदान करती है, जिसमें विशेष रूप से कॉर्पोरेट से प्राप्त दान शामिल है। इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय ने भी महत्त्वपूर्ण माना।
दरअसल, यह ‘जानने के अधिकार’ का स्पष्ट उल्लंघन है, क्योंकि मतदाताओं को इस सूचना से वंचित किया गया है कि उनका वोट मांगने वाले लोगों का वित्तपोषण कौन कर रहा है। चुनावी बॉण्ड योजना के लागू होते ही इसे न्यायालय में चुनौती दी गई, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने पहले तो इस पर सुनवाई को लटकाए रखा और फिर समय की कमी का हवाला देते हुए इसे चुनाव के बाद तक के लिये स्थगित कर दिया। इस अंतराल में चुनावी बॉण्ड के माध्यम से भारी मात्रा में अनाम धन जुटा लिया गया और इसका एक बड़ा हिस्सा सत्तारूढ़ दल को प्राप्त हुआ।
इस मुद्दे पर इसी वर्ष अप्रैल में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि सभी राजनीतिक दलों को चंदा देने से संबंधित चुनावी बॉण्ड पर रोक नहीं लगेगी। न्यायालय ने कहा कि ऐसे सभी दल, जिनको बॉण्ड के ज़रिये चंदा मिला है, वे सीलबंद कवर में चुनाव आयोग को इसका ब्योरा देंगे। केंद्र सरकार ने न्यायालय से आग्रह किया था कि वह चुनाव प्रक्रिया के दौरान चुनावी बॉण्ड के मुद्दे पर आदेश पारित न करे।

विफल होती गुप्त मतदान की अवधारणा

दूसरा विषय गुप्त मतदान का है। इन चुनावों के दौरान से सत्तारूढ़ दल की उम्मीदवार मेनका गांधी ने मुस्लिम मतदाताओं को धमकी दी कि वे उन्हें वोट दें वरना चुने जाने पर वह उनकी किसी प्रकार की कोई सहायता नहीं करेंगी। उनके इस बयान पर देश में व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली। वर्ष 2017 में मुकुलिका बनर्जी ने इस ओर ध्यान दिलाया था और अभी हाल में पत्रकार इशिता त्रिवेदी ने भी इस बात को दोहराया कि राजनीतिक दल अब बूथ विशेष के स्तर पर मतदान के परिणाम का पता लगाने में सक्षम हैं। इससे गुप्त मतदान की अवधारणा ही विफल हो गई है और मेनका गांधी द्वारा दी गई धमकी से निर्वाचन प्रक्रिया का निष्पक्ष रह पाना संभव नहीं है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका दायर कर चुनाव में टोटलाइज़र मशीन के उपयोग का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था जिससे मतपत्र की गोपनीयता बनी रहती, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने बिना सुनवाई किये ही इस याचिका को खारिज कर दिया।

मतदान की स्वतंत्रता का मुद्दा

तीसरा विषय मतदान की स्वतंत्रता का है। इन चुनावों में मतदाताओं की ऐसी कई शिकायतें सामने आईं जिनके नाम बिना किसी सूचना या सुनवाई के मतदाता सूची से हटा दिये गए थे। हालाँकि यह कोई नई बात भी नहीं है, यह समस्या लगभग हर चुनाव में देखने को मिलती है। पिछले वर्ष तेलंगाना विधानसभा चुनाव के समय भी यह मामला सामने आया था और निर्वाचन आयोग ने स्वीकार भी किया था कि व्यवस्था में यह समस्या विद्यमान है। तब आरोप लगाया गया था कि निर्वाचन आयोग मतदाता सूची को फूलप्रूफ बनाने के लिये अनधिकृत रूप से आधार लिंकिंग के साथ एक अनऑडिटेड डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर का उपयोग कर रहा था, जिसने बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम भी मतदाता सूची से हटा दिये थे।
इसी के मद्देनज़र पिछले वर्ष के उत्तरार्द्ध में हैदराबाद के एक टेक्नोलॉजिस्ट ने उच्च न्यायालय में एक मामला दायर कर कहा कि निर्वाचन आयोग अपने एल्गोरिद्म के सोर्स कोड का खुलासा करे और इसे ऑडिट के लिये उपलब्ध कराए। कई माह गुज़र गए, आम चुनाव शुरू होकर समाप्त हो गए, लेकिन उच्च न्यायालय इस याचिका पर कोई निर्णय लेने में विफल रहा।

निर्वाचन प्रक्रिया पर सार्वजनिक विश्वास की बहाली

अंतिम विषय के रूप में हम निर्वाचन प्रक्रिया पर सार्वजनिक विश्वास के मुद्दे पर विचार करेंगे। मार्च के मध्य में 20 विपक्षी दलों ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी, जिसमें EVM के उपयोग के बारे में कुछ आशंकाएँ जताई गई थीं। याचिका में अनुरोध यह किया गया था कि वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) मशीनों का उपयोग करके मतदान में इस्तेमाल होने वाली 50 प्रतिशत EVM का सत्यापन किया जाए। इस संबंध में निर्वाचन आयोग की एकमात्र आपत्ति यह थी कि इससे मतगणना में काफी समय लग जाएगा और पूरी मतगणना करने में छह दिन तक का समय लग सकता है। लेकिन जब हम सात चरणों में डेढ़ माह तक चले चुनावों के संदर्भ में इसे देखें तो सार्वजनिक विश्वास की बहाली के लिये छह और दिनों का विस्तार कोई बड़ा मुद्दा नहीं था। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया और बिना किसी विस्तृत तर्क के केवल प्रति निर्वाचन क्षेत्र EVM सत्यापन की संख्या को 1 से बढ़ाकर 5 करने का निर्देश दिया।
हम कह सकते हैं कि विगत वर्षों में कई मौकों पर सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय लोकतंत्र की गरिमा, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में वोट के महत्त्व के बारे में कई आदेश दिये हैं। इनके परिप्रेक्ष्य में देखें तो लगता है कि हमारी न्यायपालिका काफी मुखर है। बेशक हमारा लोकतंत्र एक उपलब्धि है जिस पर गर्व किया जा सकता है, लेकिन लोकतंत्र स्वयं ही जीवंत नहीं रह सकता। यदि इसे लेकर कोई भी संदेह उठता है तो कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों का यह फ़र्ज़ है कि उसका तुरंत निवारण किया किया जाए। लेकिन देखने में आया है कि पिछले कुछ वर्षों से मतदाताओं के जानने के अधिकार, गुप्त मतदान और वोट देने की स्वतंत्रता को बेहद कम महत्त्व दिया गया है...और यही कारण है कि इससे चुनाव की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हुआ है।
ऐसे किसी भी अवसर पर जब भी मामला न्यायालय के समक्ष लाया गया तो उसके समाधान के बजाय इसे टालने की प्रवृत्ति ही अधिक दिखाई दी है। इससे तो यही प्रतीत होता है कि न्यायालय के पास बातें तो बहुत हैं, लेकिन बड़े बदलावों को लेकर वह बहुत उत्सुक नहीं है।

न्यायालयों में सुधार


General Studies-II . Judicial Review . Prevention mechanism


चर्चा में क्यों?
हाल ही में पठानकोट की एक विशेष न्यायालय ने कठुआ मामले पर अपना फैसला सुनाया। यह निर्णय अपराध के अठारह महीने बाद दिया गया। यह अपेक्षाकृत एक त्वरित निर्णय था क्योंकि भारत में ज़्यादातर मामलों में पुलिस और न्यायपालिका दोनों स्तरों पर देरी के कारण उन्हें निस्तारित करने में अधिक समय लगता है
प्रमुख बिंदु
§  भारत की अधीनस्थ अदालतों में ऐसे 31 मिलियन मामलों में से एक तिहाई से अधिक मामले तीन वर्षों से लंबित हैं जिनमें अभी तक फर्स्ट-पोर्ट-ऑफ-कॉल (first port-of-call) भी नहीं हुआ है। जबकि उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों के संदर्भ में यह आँकड़ा और भी अधिक है, देश भर के सभी उच्च न्यायालयों में 8 मिलियन मामलों में से आधे मामले तीन साल से अधिक समय से लंबित हैं।
§  वित्त मंत्रालय के वर्ष 2017 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, आर्थिक और वाणिज्यिक मामलों का धीमी गति से निस्तारण देश में निवेश चक्र को पुनर्जीवित करने वाले सबसे बड़े अवरोधों में से एक है। हालाँकि सरकार द्वारा व्यापार और वाणिज्य को आसान बनाने के लिये व्यापक रूप से प्रयास किये जा रहे हैं तथापि लंबित मामलों के चलते निवेश पर इसका प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। जब न्यायालयों में दर्ज मामले वर्षों तक लंबित रहते हैं, तो इसका समाज और अर्थव्यवस्था दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
§  वर्तमान सरकार का अगला कदम व्यापार करने में आसानी से संबधित है जिसके अंतर्गत अपीलीय और न्यायिक क्षेत्र में लंबित मामलों का शीघ्र निपटान, सुनवाई में होने वाली देरी आदि को निस्तारित करने पर बल देना है।
§  इससे विवादों के समाधान और अनुबंध प्रवर्तन (Contract Enforcement) में बाधा उत्पन्न हो रही है, निवेश के हतोत्साहित (Discouraging Investment) होने से परियोजनाओं का कार्य बाधित होता है, साथ ही कर संग्रह में भी बाधा उत्पन्न होती है, करदाताओं पर तनाव बढ़ता है और कानूनी लागत में इज़ाफा होता है।
§  इसके लिये सरकार एवं न्यायपालिका में समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता है जिससे कानूनी विलंब (law Delay’s) के कारणों की पहचान करते हुए आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकें।
§  समाचार पत्र द मिंट (Mint) के सर्वेक्षण के अनुसार, यह एक देशव्यापी समस्या है, लेकिन देश के कुछ राज्य की स्थिति तुलनात्मक रूप से अधिक खराब हैं, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और बिहार जैसे राज्यों के अधीनस्थ न्यायालयों में लगभग 50% से अधिक मामले बीते 3 वर्षों से लंबित पड़े हुए हैं। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि निचली अदालतों में लंबित मामले का सीधा प्रभाव ऊपरी अदालतों पर पड़ता है एवं वहाँ भी मामले लंबित होने लगते हैं।
§  कोलकाता तथा उड़ीसा उच्च न्यायालय दोनों में संयुक्त रूप से 70% मामले तीन वर्षों से लंबित हैं। इसके विपरीत कुछ उच्च न्यायालय ऐसे भी हैं, जहाँ मामलों का निस्तारण अधिक तेज़ी से होता हैं। उदाहरण के लिये, पंजाब और हरियाणा में 6% से भी कम लंबित मामले तीन साल से अधिक समय से लंबित हैं।
§  कुल मिलाकर, देश के पूर्वी राज्यों में पश्चिमी राज्यों की तुलना में बहुत अधिक मुकदमें लंबित पड़े हुए हैं।
§  भारतीय न्यायिक प्रणाली के अंतर्गत लंबित मामलों के निपटारे की क्षमता, उसके पास उपलब्ध संसाधनों एवं लंबित मामलों की मात्रा और प्रक्रिया पर निर्भर करती है। वर्ष 2006 में भारत की निचली अदालतों में 15 मिलियन मामले लंबित थे और वर्ष 2017 में यह आँकड़ा बढ़कर 20 मिलियन हो गया।
§  विधिक शोधकर्त्ताओं के अनुसार, न्यायालयों में दाखिल होने वाले मामलों में वृद्धि देश के विकास का द्योतक होती है: यह न केवल एक समृद्ध समाज में अधिकारों के प्रति अधिक जागरूकता को प्रकट करती है बल्कि लोगों को अपने अधिकारों की सुरक्षा हेतु न्यायालयों की ओर रुख करने के लिये भी प्रोत्साहित करती है।
§  कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के उच्च न्यायालय भी रिट याचिकाओं (यह तब दायर की जाती है जब ऐसा प्रतीत हो कि मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है) को स्वीकार करने में अत्यधिक उदार रवैया अपनाने लगे है इस व्यवहार के चलते 26% रिट याचिकाएँ ऐसी हैं जो पिछले पाँच सालों से अधिक समय से लंबित पड़ी हैं।
§  इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि न्यायालयों पर मुकदमों का बोझ तो लगातार बढ़ा है, लेकिन उसके अनुरूप न्यायालय के संसाधनों में कोई वृद्धि नहीं हुई हैं। जिसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि बीते 18 वर्षों में पहली बार भारत के सर्वोच्च न्यायालय में सभी पदों पर नियुक्ति (31 न्यायाधीशों के साथ) पूर्ण हुई है। अन्य न्यायालयों में कालानुक्रमिक रूप से न्यायाधीशों की कमी बनी हुई हैं।
§  भारत के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के पदों की स्वीकृत संख्या 1,049 है लेकिन वर्तमान में कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या केवल 680 हैं अर्थात् लगभग 37% पद रिक्त है। इसी तरह निचली अदालतों में भी न्यायाधीशों के 25% पद रिक्त पड़े हैं।
आगे की राह
§  इसका स्पष्ट समाधान यह है कि अदालतों की स्वीकृत पदों की संख्या में वृद्धि करते हुए और अधिक न्यायाधीशों को नियुक्त करना होगा। वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर ने अनुमान व्यक्त किया था कि भारत में न्यायपालिकाओं में लंबित बैकलॉग मामलों को निस्तारित करने के लिये 70,000 अधिक न्यायाधीशों की आवश्यकता है।
§  पिछले कई वर्षों में विभिन्न आयोगों ने इस मुद्दे से व्यापक रूप से निपटने के लिये कई सिफारिशें पेश की हैं। उदाहरण के लिये, वर्ष 2005 में 11वें वित्त आयोग ने न्यायालयों में लंबित मामलों का तीव्रता से निस्तारण करने के लिये फास्ट-ट्रैक अदालतों के गठन की सिफारिश की थी।
§  हाल ही में वर्ष 2014 में 245वें विधि आयोग ने और अधिक छोटे मामलों (जैसे- यातायात अपराधों आदि) की सुनवाई के संदर्भ में हाल के कानून विशेषज्ञों द्वारा विशेष अदालतों की स्थापना किये जाने तथा निचली अदालतों में न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने की सिफारिश की।
§  वर्ष 2018 में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने केंद्रीय न्यायिक सेवा आयोग की तर्ज पर निचली अदालतों के लिये एक केंद्रीकृत भर्ती प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया था। इनमें से कुछ सिफारिशों, जैसे- फास्ट-ट्रैक कोर्ट (कठुआ मामले में प्रयुक्त) को लागू भी किया गया, लेकिन अधिकतर सिफारिशों के संबंध में कोई कार्यवाही नहीं की गई।
यह देखते हुए कि न्यायालयों में लंबित मामले भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं, इस संदर्भ में जल्द-से-जल्द आवश्यक सुधार एवं प्रभावी उपाय किये जाने की आवश्यकता है।


भारत में जेल सुधार और इससे संबंधित चुनौतियाँ

          General Studies-II . Judicial review 


             



चर्चा में क्यों?

पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो (Bureau of Police Research and Development-BPRD) द्वारा 12 एवं 13 सितंबर, 2019 को ‘जेलों में आपराधिक गतिविधियाँ और कट्टरता : कैदियों एवं जेल कर्मचारियों की असुरक्षा और उनका संरक्षण’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया।

प्रमुख बिंदु:

  • इस अवसर पर जेल सुधार के क्षेत्र में विभिन्‍न चुनौतियों पर चर्चा की गई और इसके साथ ही जेल प्रणालियों एवं संबंधित मानव संसाधन को बेहतर बनाने के लिये एक नीति बनाने की आवश्‍यकता पर बल दिया गया।
    • उल्लेखनीय है कि जेलों में सुरक्षा सुनिश्चित करने, कैदियों के रहन-सहन का स्‍तर बेहतर करने और जेलों को एक सुधार केंद्र में तब्‍दील करने की ज़रूरत है।

भारत में जेल सुधार की आवश्यकता:

  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Records Bureau-NCRB) के आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2015 में भारतीय जेलों में क्षमता से 14 गुना अधिक कैदी बंद थे। वर्ष 2015 के बाद भी इन आँकड़ों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिली है, परंतु चिंतनीय स्थिति यह है कि इस अवधि में जेलों की संख्या में कुछ खास वृद्धि नहीं हुई है।
  • उपरोक्त आँकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि जेलों में कैदियों की स्थिति कितनी खराब है। जेल सांख्यिकी 2015 के अनुसार, जेल की खराब स्थिति के कारण वर्ष 2015 में कुल 1,584 लोगों की मृत्यु हो गई थी।
  • जानकारों के अनुसार, जेलों की खराब स्थिति और उसमें आवश्यकता से अधिक कैदी होने का मुख्य कारण न्यायालयों में लंबित मामलों की एक बड़ी संख्या है। वर्ष 2017 में सरकार ने सूचित किया था कि भारतीय न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 2 करोड़ 60 लाख से अधिक हो गई है।
  • इसकी एक अन्य वजह न्यायिक प्रक्रिया का महँगा हो जाना भी है, आज देश में कई कैदी सिर्फ इसलिये जेल में रहते हैं, क्योंकि उनके पास ज़मानत के लिये पैसे नहीं हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, देश की जेलों में लगभग 70 फीसदी कैदी ऐसे हैं जिन पर अभी तक जुर्म साबित भी नहीं हो पाया है।
  • साथ ही जेलों में कैदियों की अधिक संख्या होने के कारण उन्हें आवश्यक पौष्टिक आहार तथा स्वच्छ वातावरण भी नहीं मिल पाता है।
  • जेल सुधार के संदर्भ में कई समाज सेवकों ने यह प्रश्न उठाया है कि भारतीय राजनेता इस ओर मात्र इसलिये ध्यान नहीं देते क्योंकि जेलों में बंद कैदी उनकी वोट बैंक सीमा में नहीं आते।

जेल सुधार की चुनौतियाँ :

  • जेलों में ज़रूरत से ज़्यादा कैदियों को रखा जाना।
  • विचाराधीन कैदियों की अधिक संख्‍या।
  • जेलों में अपर्याप्‍त बुनियादी ढाँचागत सुविधाएँ।
  • जेलों में आपराधिक गतिविधियाँ एवं कट्टरता।
  • महिला कैदियों एवं उनके बच्‍चों की सुरक्षा।
  • समुचित जेल प्रशासन के लिये धन एवं स्‍टाफ की कमी।

जेल सुधार हेतु प्रयास

  • जेल आधुनिकीकरण योजना: जेल आधुनिकीकरण योजना की शुरुआत वर्ष 2002-03 में जेलों, कैदियों और जेलकर्मियों की स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। इस योजना में नई जेलों का निर्माण, मौजूदा जेलों की मरम्मत और नवीनीकरण, स्वच्छता और जल आपूर्ति में सुधार आदि शामिल थे।
  • ई-जेल परियोजना: ई-जेल परियोजना का उद्देश्य डिजिटलीकरण के माध्यम से जेल प्रबंधन की दक्षता को बढ़ाना है। ई-जेल परियोजना जेल प्रबंधन में कैदी सूचना प्रबंधन प्रणाली (Prisoner Information Management system-PIMS) को जोड़ती है जो कैदियों की जानकारी को रिकॉर्ड करने और प्रबंधित करने तथा विभिन्न प्रकार की रिपोर्ट बनाने के लिये सहायक है।
  • मॉडल जेल मैनुअल, 2016: यह मैनुअल जेल कैदियों के लिये उपलब्ध कानूनी सेवाओं (मुफ्त सेवाओं सहित) के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है।
  • राष्ट्रीय विधि सेवा प्राधिकरण (National Legal Services Authority-NALSA): NALSA ने विचाराधीन कैदियों को मुफ्त कानूनी सेवाओं सहित कई अन्य सेवाएँ देने के लिये एक वेब आधारित एप्लीकेशन की शुरुआत की थी। इस एप्लीकेशन का उद्देश्य कानूनी सेवा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और उपयोगी बनाना था।
  • जेल सुधारों और सुधारात्मक प्रशासन पर राष्ट्रीय नीति मसौदा: इस मसौदे के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
    • जेलों को संविधान की समवर्ती सूची में शामिल करना।
    • जेलों से संबंधित मामलों पर एक समान और व्यापक कानून का निर्माण।
    • प्रत्येक राज्य में जेल और सुधार सेवाओं संबंधी एक विभाग का निर्माण।
    • सभी राज्य प्रत्येक जेल और संबंधित संस्थान में रहने की स्थिति में सुधार करेंगे।

आगे की राह

  • जेल संबंधी सुधारों को निम्नलिखित दो समस्याओं से निपटने के लिये तैयार किया जाना चाहिये:
    • जेल प्रशासन में संसाधनों की कमी।
    • यह मानसिकता कि जो जेल में रहते हैं वे सुविधाओं के लायक नहीं हैं।
  • कैदियों की अधिक संख्या, जेल में क्रूरता और कट्टरता, स्वच्छता की कमी तथा जेल में रहन-सहन के अस्वीकार्य मानकों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिये।

Monday, 20 July 2020

विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और राज्यपाल की भूमिका





लोकतंत्र के चार स्तंभ कौन से हैं?
    
आज़ादी के बाद भारतीय संविधान के निर्माताओं ने देश के लोकतंत्र को मज़बूत बनाने और शासन व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिये केंद्रीय स्तर पर जहाँ संसद की व्यवस्था की, वहीं राज्यों में विधानसभा के गठन का प्रस्ताव किया। इसके साथ ही लोकसभा के संचालन और गरिमा बनाए रखने के लिये लोकसभा अध्यक्ष और राज्यों में विधानसभा अध्यक्ष के पद का प्रावधान किया।
राज्यों में विधानसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही और उसकी गतिविधियों के संचालन के लिये पूरी तरह जवाबदेह होता है। विधानसभा अध्यक्ष से यह अपेक्षित होता है कि वह दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सभी दलों के साथ तालमेल बनाकर इस पद की गरिमा को बरकरार रखेगा। विधानसभा अध्यक्ष का निर्विरोध निर्वाचित होना और उसका किसी भी दल के प्रति झुकाव नहीं होने वाला स्वरूप समाज की उस राजनीतिक जागरूकता का प्रतीक है जो लोकतंत्रीय व्यवस्था की प्रमुख आधारशिला है।
सीधे-सरल शब्दों में कहें तो विधायिका का काम कानून बनाना है, कार्यपालिका कानूनों को लागू करती है और न्यायपालिका कानून की व्याख्या करती है। इन तीनों को लोकतंत्र का आधार-स्तंभ माना जाता है।

विधानसभाध्यक्ष के कर्त्तव्य और अधिकार

विधानसभा अध्यक्ष राज्य विधायिका का एक प्रमुख अंग होता है। हालिया कर्नाटक मामले में हमने देखा कि राज्यपाल से कई बार समय-सीमा का अल्टीमेटम मिलने के बाद भी विधानसभाध्यक्ष ने अपने विवेकानुसार ही राज्यसभा में शक्ति परीक्षण कराया। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक गया, लेकिन उसने भी विधानसभाध्यक्ष को कोई भी निर्देश न देते हुए उनके अधिकारों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

राज्यों की विधायिका विधानसभा के लिये निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से गठित होती है। इन जनप्रतिनिधियों को विधायक कहा जाता है।
  • विधानसभा की कार्यवाही को सुचारु रूप से संचालित करने के लिये एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का प्रावधान संविधान में है।
  • विधानसभा का गठन होने के बाद उसके प्रथम सत्र में ही विधानसभा सदस्यों द्वारा विधानसभा अध्यक्ष चुना जाता है।
  • अध्यक्ष के अलावा विधानसभा के सदस्य उपाध्यक्ष का चुनाव भी करते हैं, जो अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उसका कार्यभार संभालता है।
विधानसभा अध्यक्ष के प्रमुख कार्यों में वही सब कार्य आते हैं, जो लोकसभा अध्यक्ष करता है, जैसे-
  • सदन में अनुशासन बनाए रखना
  • सदन की कार्यवाही का सुचारु रूप से संचालन करना
  • सदस्यों को बोलने की अनुमति प्रदान करना
  • पक्ष और विपक्ष में समान मत आने पर निर्णायक मत प्रदान करना
पीठासीन अधिकारी यानी विधानसभा अध्यक्ष विधानसभा एवं विधानसभा सचिवालय का प्रमुख होता है, जिसे संविधान, प्रक्रिया, नियमों एवं स्थापित संसदीय परंपराओं के तहत व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं। विधानसभा के परिसर में उसका प्राधिकार सर्वोच्च है। सदन की व्यवस्था बनाए रखना उसकी ज़िम्मेदारी होती है और वह सदन में सदस्यों से नियमों का पालन सुनिश्चित कराता हैं। विधानसभा अध्यक्ष सदन के वाद-विवाद में भाग नहीं लेता, बल्कि विधानसभा की कार्यवाही के दौरान अपनी व्यवस्थाएँ/निर्णय देता है, जो बाद में नज़ीर के रूप में संदर्भित की जाती हैं। विधानसभा में अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष सदन का संचालन करता है और दोनों की अनुपस्थिति में सभापति रोस्टर का कोई एक सदस्य यह ज़िम्मेदारी निभाता है।

विधानसभा सचिवालय

संविधान में यह उपबंध किया गया है कि प्रत्येक विधानसभा का अपना एक पृथक सचिवालय होगा, जिसका प्रशासकीय नियंत्रण विधानसभा अध्यक्ष के पास होगा। सचिवालय में विधानसभा के कार्य संपादित करने हेतु अधिकारी एवं कर्मचारी कार्यरत रहते हैं।
वर्तमान समय में विधानसभा द्वारा जो कार्य संपादित किये जाते हैं, उनका स्वरूप बहुत व्यापक होता है। चूँकि विधानसभा की बैठकें सीमित समय के लिये होती हैं, अत: विधानसभा के लिये यह संभव नहीं होता कि वह प्रत्येक कार्य की स्वयं सूक्ष्म जाँच करे अथवा उस पर गहन विचार-विमर्श कर सके। ऐसे में विधानसभा कतिपय कार्यों को समितियों के माध्यम से संपादित करती है। विधान सभा समितियों के माध्यम से कार्यपालिका पर प्रभावी नियंत्रण रखती है। विधानसभा की विभिन्न समितियाँ शासन से वांछित जानकारी प्राप्त करती हैं, उसका परीक्षण करती हैं। विभागीय सचिवों का मौखिक साक्ष्य लेती हैं। आवश्यकतानुसार स्थल निरीक्षण एवं अन्य राज्यों के अध्ययन हेतु दौरा भी करती हैं। परीक्षण उपरांत समितियाँ अपने प्रतिवेदन सिफारिशों के साथ समय-समय पर विधानसभा में प्रस्तुत करती हैं। यह कार्य पूरे वर्ष अनवरत चलता है।

कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका

जैसा कि हम बता चुके हैं, हमारे संविधान में राज्य की शक्तियों को तीन अंगों में बाँटा गया है- कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका। इसके अनुसार विधानपालिका का काम विधि निर्माण करना, कार्यपालिका का काम विधियों का कार्यान्वयन तथा न्यायपालिका को प्रशासन की देख-रेख, विवादों का फैसला और विधियों की व्याख्या करने का काम सौंपा गया है।
न्यायपालिका: भारत की न्यायपालिका के बारे में कहा जा सकता है कि जैसा इसका नाम है वैसा ही इसका काम है। न्यायपालिका का मूल काम, हमारे संविधान में लिखे कानून का पालन करना और करवाना है तथा कानून का पालन न करने वालों को दंडित करने का अधिकार भी इसे प्राप्त है। भारतीय न्यायिक प्रणाली को अंग्रेज़ों ने औपनिवेशिक शासन के दौरान बनाया था और उसी के अनुसार यह आज भी देश में कानून व्यवस्था बनाए रखने का काम करती है। न्यायाधीश अपने आदेश और फैसले संविधान में लिखे कानून के अनुसार लेते हैं। न्‍यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिये है। न्‍यायपालिका विवादों को सुलझाती है, इसलिये इसकी स्‍वतंत्रता की रक्षा ज़रूर होनी चाहिये।
विधायिका: भारत संघ की विधायिका को संसद कहा जाता है और राज्यों की विधायिका विधानमंडल/ विधानसभा कहलाती है। देश की विधायिका यानी संसद के दो सदन हैं- उच्च सदन राज्यसभा तथा निचला सदन लोकसभा कहलाता है। राज्‍यसभा के लिये अप्रत्‍यक्ष चुनाव होता है, इसमें राज्‍यों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्‍यों का चुनाव एकल हस्‍तांतरणीय मत के द्वारा समानुपातिक प्रतिनिधित्‍व प्रणाली के अनुसार राज्‍यों की विधानसभाओं द्वारा निर्धारित तरीके से होता है। राज्‍यसभा को भंग नहीं किया जाता, बल्कि हर दूसरे वर्ष में इसके एक-तिहाई सदस्‍य सेवानिवृत्‍त होते हैं। वर्तमान में राज्‍यसभा में 245 सीटें हैं। उनमें से 233 सदस्‍य राज्‍यों और केंद्रशासित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं और 12 सदस्‍य राष्‍ट्रपति द्वारा नामजद होते हैं।
लोकसभा जनप्रतिनिधियों की सभा है जिनका चुनाव वयस्‍क मतदान के आधार पर प्रत्‍यक्ष चुनाव द्वारा होता है। संविधान द्वारा परिकल्पित सदन के सदस्‍यों की अधिकतम संख्‍या 552 है (530 सदस्‍य राज्‍यों का प्रतिनिधित्‍व करने के लिये, 20 केंद्रशासित क्षेत्रों का प्रतिनिधित्‍व करने के लिये और एंग्लो-इंडियन समुदाय के दो सदस्‍य राष्‍ट्रपति द्वारा नामजद किये जा सकते हैं, यदि उसके विचार से उस समुदाय का सदन में पर्याप्‍त प्रतिनिधित्व नहीं है)। वर्तमान में लोकसभा में 545 सदस्‍य हैं। इनमें से 530 सदस्‍य प्रत्‍यक्ष रूप राज्‍यों से चुने गए हैं और 13 केंद्रशासित क्षेत्रों से, जब‍कि दो को एंग्लो-इंडियन समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिये राष्‍ट्रपति द्वारा मनोनीत किया जाता है। लोकसभा का कार्यकाल इसकी पहली बैठक की तारीख से पाँच वर्ष का होता है, जब तक कि इसे पहले भंग न किया जाए।

कार्यपालिका

संघीय कार्यपालिका में राष्‍ट्रपति, उपराष्‍ट्रपति और राष्‍ट्रपति को सहायता करने एवं सलाह देने के लिये अध्‍यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री के साथ मंत्रिपरिषद होती है। केंद्र की कार्यपालिका शक्ति राष्‍ट्रपति को प्राप्‍त होती है, जो उसके द्वारा केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर संविधान सम्मत तरीके से इस्तेमाल की जाती है। राष्‍ट्रपति के चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्‍य तथा राज्‍यों में विधानसभा के सदस्‍य समानुपातिक प्रतिनिधित्‍व प्रणाली के तहत मतदान करते हैं। उपराष्‍ट्रपति के चुनाव में एकल हस्तांतरणीय मत द्वारा संसद के दोनों सदनों के सदस्‍य मतदान के पात्र होते हैं।
राष्‍ट्रपति को उसके कार्यों में सहायता करने और सलाह देने के लिये प्रधानमंत्री के नेतृत्‍व में मंत्रिपरिषद होती है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्‍ट्रपति द्वारा की जाती है और वह प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्‍य मंत्रियों की नियुक्ति करता है। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्‍तरदायी होती है। संघ के प्रशासन या कार्य और उससे संबंधित विधानों और सूचनाओं के प्रस्‍तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों की सूचना राष्‍ट्रपति को देना प्रधानमंत्री का कर्त्तव्य है। मंत्रिपरिषद में कैबिनेट मंत्री, राज्‍य मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) और राज्‍य मंत्री होते हैं।

तीनों के बीच संतुलन बेहद ज़रूरी

  • विधायिका, कार्यपालिका और न्या‍यपालिका को अपने सभी उत्तरदायित्‍व पूर्ण करने चाहिये तथा इन तीनों के बीच संतुलन को बनाए रखने के लिये किसी को भी दूसरे के कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये।
  • विभिन्न प्रावधानों के तहत संविधान ने विधायिका और न्यायपालिका के बीच संबंधित कार्यप्रणाली में अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिये स्पष्ट रूप से रेखा खींची है।
  • भारत के संविधान में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन सरकार के विभिन्न अंगों के कार्यों में पर्याप्त अंतर है। इस प्रकार सरकार का एक अंग दूसरे अंग के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
  • अनुच्छेद 121 और 211 विधायिका को अपने कर्त्तव्यों के निर्वहन में किसी भी न्यायाधीश के आचरण पर चर्चा करने से रोकते हैं, वहीं दूसरी तरफ अनुच्छेद 122 और 212 अदालतों को विधायिका की आंतरिक कार्यवाही पर निर्णय लेने से रोकते हैं।
  • संविधान के अनुच्छेद 105 (2) और 194 (2) विधायकों को उनकी भाषण की स्वतंत्रता और वोट देने की आज़ादी के संबंध में अदालतों के हस्तक्षेप से रक्षा करते हैं।
देखा यह गया है कि जब कार्यपालिका अपने दायित्व निर्वहन में विफल रहती है, तब न्यायपालिका उसके कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करती है। 1972 में केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 13 जजों की अब तक की सबसे बड़ी संविधान पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट कर दिया था कि भारत में संसद नहीं बल्कि संविधान सर्वोच्च है। इस सिद्धांत के तहत संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र की लक्ष्मण रेखा स्पष्ट खींच दी गई है। कानून बनाना विधायिका का काम है, इसे लागू करना कार्यपालिका का और विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों के संविधान सम्मत होने या न होने की जाँच करना न्यायपालिका का काम है। इन तीनों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिये यह ज़रूरी है कि न्यायपालिका, संसद और कार्यपालिका के बीच एक-दूसरे के लिये आपसी सम्मान होना चाहिये और इन सभी पर किसी प्रकार का कोई 'बाहरी दबाव' नहीं होना चाहिये।

गठबंधन सरकारों के दौर में राज्यपाल की भूमिका

हाल ही में कर्नाटक में हुई राजनीतिक उठापटक में राज्यपाल वजुभाई वाला की भूमिका तब सामने आई, जब उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को सदन में शक्ति परीक्षण कराने का निर्देश कई बार दिया। भारत का संविधान संघात्मक है तथा इसमें संघ तथा राज्यों के शासन के संबंध में प्रावधान किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 153 से 156, 161,163 एवं 164(1) तथा 213(1) में राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों का उपबंध किया गया है। संघीय व्यवस्था में राज्यपाल राज्य और कार्यपालिका के औपचारिक प्रमुख के रूप में काम करता है, विशेषकर तब, जब राजनीतिक उथल-पुथल होती है। ऐसी स्थिति में जहाँ दो या अधिक दल सरकार बनाने का दावा पेश कर रहे हों, राज्यपाल को कानूनी एवं संवैधानिक पक्षों को ध्यान में रखते हुए निर्णय करना होता है। परंतु वर्तमान में राज्यपाल पद की प्रवृत्ति में व्यापक भिन्नता देखी गई है और इसकी नज़ीर कर्नाटक विधानसभा में देखी गई। ऐसे में यह कहना आतिशयोक्ति न होगा कि गठबंधन सरकारों के इस दौर में राज्यपाल की भूमिका केंद्र के एजेंट के रूप में अधिक परिलक्षित होती है। हालिया समय में मणिपुर, मेघालय और गोवा में राज्यपालों की ऐसी ही भूमिका देखने को मिली। परंतु राज्यपाल का यह निर्णय उसके स्वविवेक पर निर्भर होता है। संविधान का अनुच्छेद 163 राज्यपाल को विवेकाधिकार की शक्ति प्रदान करता है अर्थात् राज्यपाल स्वविवेक संबंधी कार्यों में मंत्रिपरिषद का सुझाव लेने के लिये बाध्य नहीं है। राज्यपाल की इन विवेकाधीन शक्तियों पर न्यायालय भी प्रश्नचिह्न नहीं लगा सकता।
  • राज्यपालों को केंद्र सरकार का एजेंट न समझा जाए, इसके लिये वर्ष 1966 में प्रशासनिक सुधार आयोग, वर्ष 1969 में राजमन्नार समिति, वर्ष 1970 में भगवान सहाय समिति, वर्ष 1988 में सरकारिया आयोग तथा वर्ष 2011 में पुंछी आयोग ने राज्यपालों की भूमिका को लेकर कई प्रकार की सिफारिशें दी थीं, लेकिन इन पर अमल किसी भी सरकार ने नहीं किया।

सदन में सिद्ध करना होता है बहुमत (बोम्मई जजमेंट)

यह मामला भी कर्नाटक से जुड़ा है। 13 अगस्त, 1988 से 21 अप्रैल, 1989 तक कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे एस.आर. बोम्मई की सरकार को फोन टैपिंग मामले में फँसने के बाद तत्कालीन राज्यपाल ने बर्खास्त कर दिया था, जिसके बाद यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुँचा था। नज़ीर माने जाने वाले इस फैसले में न्यायालय ने कहा, 'किसी भी राज्य सरकार के बहुमत का फैसला राजभवन आदि की जगह विधानमंडल में होना चाहिये। राष्ट्रपति शासन लगाने से पहले राज्य सरकार को शक्ति परीक्षण का मौका देना होगा।'
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 11 मार्च, 1994 को दिया था राज्यों में सरकारें भंग करने की केंद्र सरकार की शक्ति को कम करने वाला ऐतिहासिक बोम्मई जजमेंट।
  • धारा 356 के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिये दिये गए इस फैसले को ही बोम्मई जजमेंट के नाम से जाना जाता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 356 के व्यापक दुरुपयोग पर विराम लगा दिया।
  • इस मामले में 9-सदस्यीय संविधान पीठ ने राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने के संदर्भ में दिशा-निर्देश तय किये।
  • यह निर्णय भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने यह तय कर दिया कि बहुमत होने-न होने का फैसला सदन में होना चाहिये, राजभवन में या कहीं और नहीं।
  • बोम्मई जजमेंट का असर तब देखने को मिला था जब 1997 और 1998 में तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने धारा 356 के इस्तेमाल से उत्तर प्रदेश और बिहार की सरकारों को बर्खास्त करने के केंद्र के प्रस्ताव को वापस भेज दिया था।
बोम्मई जजमेंट के बाद विधानसभाओं को भंग करने का सिलसिला तो लगभग खत्म हो चुका है, लेकिन राज्यपालों के माध्यम से अपनी पसंद की सरकार बनवाने का प्रयास केंद्र की तरफ से जारी है।
लोकतंत्र के चार स्तंभ कौन से हैं?
इसी लोकतंत्र को बनाये रखने के लिए चार मजबूत स्तम्भो को निर्मित किया गया ।
1. न्यायपालिका
2. कार्यपालिका
3. विधायका
4. मीडिया


भारतीय दण्ड संहिता, 1860

  भारतीय दण्ड संहिता   भारत   के अन्दर भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किये गये कुछ   अपराधों   की परिभाषा व   दण्ड   का प्रावधान करती है। किन...